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Monday, 4 April 2011

कोई पुरुष स्त्री के सामने कब हो जाता है बोना?

  गृहस्थी बसाना सभी को पसंद है भले ही मजबूरी हो या मौज। अधिकांश लोग इससे गुजरते जरूर हैं। जब-जब गृहस्थी में अशांति आती है तब आदमी इस बात को लेकर परेशान रहता है कि क्या किसी के दाम्पत्य में शांति भी होती है। समझदार लोग गृहस्थ जीवन में शांति तलाश लेते हैं।

आचार्य श्रीराम शर्मा ने अपने एक वक्तव्य  में गृहस्थी में अशांति के कारण को वासना भी बताया है। उन्होंने कहा है वासना के कारण पुरुष स्त्री के प्रति और कभी-कभी स्त्री पुरुष के प्रति जैसा द्वेष भाव रख लेते हैं उससे परिवारों में उपद्रव होता है। एंजिलर मछली का उदाहरण उन्होंने दिया है।

यह मछली जब पकड़ी गई इसका आकार था 40 इंच। मामला बड़ा रोचक है लेकिन नर एंजिलर पकड़ में नहीं आ रहा था क्योंकि वह उपलब्ध नहीं था। एक  बार तो यह मान लिया गया कि इसकी नर जाति होती ही नहीं होगी। लेकिन एक दिन एक वैज्ञानिक को मादा मछली की आंख के ऊपर एक बहुत ही छोटा मछली जैसा जीव नजर आया जो मादा  मछली का रक्त चूस रहा था। यह नर मछली था। मादा का आकार 40 इंच था और नर  का 4 इंच। पं. शर्मा ने इसकी सुंदर व्याख्या करते हुए कहा था कि  नारी को भोग और शोषण की सामग्री मानने वाला पुरुष ऐसा ही बोना होता है। जो मातृशक्ति को रमणीय मानकर भोगने का ही उद्देश्य रखेंगे वे जीवन में एंजिलर नर मछली की तरह बोने रह जाएंगे।

हम इस में यह समझ लें कि जानवरों में उनकी अशांति का कारण वासनाएं होती हैं। केवल बिल्ली की बात करें बिल्ली का रुदन उसकी देह की पीड़ा नहीं उसकी उत्तेजित कामवासना का परिणाम है। ठीक इसी तरह मनुष्य भी इनके परिणाम भोगता है और उसका रुदन ही परिवार में अशांति का प्रतीक है।

Wednesday, 15 December 2010

जीवन मृत्यु

जगत में जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है वह सब परिवर्तनशील है। दूसरे शब्दों में, वह सब काल के गाल में समाता जा रहा है। चहचहाट करते हुए पक्षी, भागदौड़ करते हुए पशु, लहलहाते हुए पेड़-पौधे, वनस्पति, प्रकृति में हलचल मचाकर मस्तिष्क को चकरा देने वाले आविष्कार करते हुए मनुष्य सभी एक दिन मर जायेंगे। कई मर गये, कइयों को रोज मरते हुए हम अपने चारों ओर देख ही रहे हैं और भविष्य में कई पैदा हो-होकर मर जायेंगे।

कोई आज गया कोई कल गया कोई जावनहार तैयार खड़ा । 
नहीं कायम कोई मुकाम यहाँ चिरकाल से ये ही रिवाज रहा ।। 

दादा गये, पिता गये, पड़ोसी गये, रिश्तेदार गये, मित्र गये और एक दिन हम भी चले जाएँगे इस तथा कथित मौत के मुँह में। यह सब देखते हुए, जानते हुए, समझते हुए भी 50 वर्षवाला 60, 60 वर्षवाला 70, 70 वर्ष वाला 80 और 90 वाला 100 वर्ष उम्र देखने की इच्छा करता है। 100 वर्ष वाला भी मरना नहीं चाहता। मौत किसी को पसन्द नहीं है।

बगीचे में वही के वही पेड़-पौधे, फूल-पत्ते ज्यों के त्यों बने रहें, उनकी काट-छाँट न की जाय, नये न लगायें जाएँ, उनको सँवारा न जाय तो बगीचा बगीचा नहीं रहेगा, जंगल बन जायेगा। बगीचे में काट-छाँट होती रहे, नये पौधे लगते रहें, पुराने, सड़े-गले, पुष्पहीन, ठूँठ, बिनजरूरी पौधे हटा दिये जायें और नये, सुगन्धित, नवजीवन और नवचेतना से ओतप्रोत पौधे लगाये जाएँ यह जरूरी है।

चाँद सफर में, सितारे सफर में । 
हवाएँ सफर में, दरिया के किनारे सफर में । 
अरे शायर ! वहाँ की हर चीज सफर में । 
....तो आप बेसफर कैसे रह सकते हैं ?

मौत तो एक पड़ाव है, एक विश्रान्ति-स्थान है। उससे भय कैसा? यह तो प्रकृति की एक व्यवस्था है। यह एक स्थानान्तर मात्र है। उदाहरणार्थ, जैसे मैं अभी यहाँ हूँ। यहाँ से आबू चला जाऊँ तो यहाँ मेरा अभाव हो गया, परन्तु आबू में मेरी उपस्थिति हो गई। आबू से हिमालय चला जाऊँ तो आबू में मेरा अभाव हो जायेगा और हिमालय में मेरी हाजिरी हो जायेगी। इस प्रकार मैं तो हूँ ही, मात्र स्थान का परिवर्तन हुआ।

मृत्यु नवीनता को जन्म देने में एक संधिस्थान है। यह एक विश्राम स्थल है। जिस प्रकार दिन भर के परिश्रम से थका मनुष्य रात्रि को मीठी नींद लेकर दूसरे दिन प्रातः नवीन स्फूर्ति लेकर जागता है उसी प्रकार यह जीव अपना जीर्ण-शीर्ण स्थूल शरीर छोड़कर आगे की यात्रा के लिए नया शरीर धारण करता है।

"तुम्हारा न तो जीवन है और न ही मृत्यु है। तुम जीव नहीं, तुम शिव हो। तुम अमर हो। तुम अनन्त अनादि सच्चिदानन्द परमात्मा हो।

मृत्यु माने महायात्रा, महाप्रस्थान, महानिद्रा। अतः जो मर गये हैं उनकी यात्रा मंगलमय हो, आत्मोन्नतिप्रद हो ऐसा चिन्तन करें न कि अपने मोह और अज्ञान के कारण उनको भी भटकाएँ और खुद भी परेशान हों।

Monday, 25 October 2010

हनुमान जी की विनयशीलता

भगवान श्रीराम वनवास काल के दौरान संकट में हनुमान जी द्वारा की गई अनूठी सहायता से अभिभूत थे। एक दिन उन्होंने कहा, ‘हे हनुमान, संकट के समय तुमने मेरी जो सहायता की, मैं उसे याद कर गदगद हो उठा हूं। सीता जी का पता लगाने का दुष्कर कार्य तुम्हारे बिना असंभव था। लंका जलाकर तुमने रावण का अहंकार चूर-चूर किया, वह कार्य अनूठा था। घायल लक्ष्मण के प्राण बचाने के लिए यदि तुम संजीवनी बूटी न लाते, तो न जाने क्या होता?’ तमाम बातों का वर्णन करके श्रीराम ने कहा, ‘तेरे समान उपकारी सुर, नर, मुनि कोई भी शरीरधारी नहीं है। मैंने मन में खूब विचार कर देख लिया, मैं तुमसे उॠण नहीं हो सकता।’
सीता जी ने कहा, ‘तीनों लोकों में कोई ऐसी वस्तु नहीं है, जो हनुमान जी को उनके उपकारों के बदले में दी जा सके।’
श्रीराम ने पुन: जैसे ही कहा, ‘हनुमान, तुम स्वयं बताओ कि मैं तुम्हारे अनंत उपकारों के बदले क्या दूं, जिससे मैं ॠण मुक्त हो सकूं।’
श्री हनुमान जी ने हर्षित होकर, प्रेम में व्याकुल होकर कहा, ‘भगवन, मेरी रक्षा कीजिए- मेरी रक्षा कीजिए, अभिमान रूपी शत्रु कहीं मेरे तमाम सत्कर्मों को नष्ट नहीं कर डाले। प्रशंसा ऐसा दुर्गुण है, जो अभिमान पैदा कर तमाम संचित पुण्यों को नष्ट कर डालता है।’ कहते-कहते वह श्रीराम जी के चरणों में लोट गए। हनुमान जी की विनयशीलता देखकर सभी हतप्रभ हो उठे!

SENDER :
Eeshay Sansthan

Sunday, 20 December 2009

विचार मंथन 14

पानी   से भरा कलश सजा हुआ था । उस पर चित्रकारी भी गयी थी । कलश पर एक कटोरी राखी थी, जिससे उसे ढक कर रखा गया था । कटोरी ने कलश से कहा - " भाई कलश ! तुम बड़े उदार हो । तुम सदा दूसरों को देते ही रहते हो। कोई भी खाली बर्तन आए, तुम उसमें अपना जल उँडेल  देते हो । किसी को खाली नहीं जाने देते । " कलश ने कहा - " हाँ, यह तो मेरा कर्त्तव्य है । मैं अपने पास आने वाले हर पात्र को भर देता हूँ । मेरे अंतस का सब कुछ दूसरों के लिए है " कटोरी बोली - " लेकिन आप कभी मुझे नहीं भरते । मैं तो हमेशा आपके सर पर मौजूद रहती हूँ ।" घट बोला - " इसमें मेरा क्या दोष ! दोष तुम्हारे अभिमानी स्वभाव का है । तुम मान -अभिमान कि चाह कि साथ सदा मेरे सर पर चढ़ी रहती हो, जबकि अन्य पात्र मेरे समक्ष आकर झुक जाते हैं । अपनी पात्रता प्रमाणित करते हैं । तुम भी अभिमान छोड़ो, विनम्र बनो, मैं तुम्हे  भी भर दूँगा।"
वस्तुत: पूर्णत्व नम्रता एवं पात्रता के विकास से ही प्राप्त होता है . कोई भी अनुदान बिना सौजन्य के नहीं मिलता । अभिमान ही सबसे बड़ी बाधा है  ।

Wednesday, 9 December 2009

विचार मंथन - 13

आज हर व्यक्ति चाहता है, मेरा पुत्र ही व्यवसाय संभाले, मेरा पुत्र या पुत्री ही मेरे स्थान पर नेता बने । मैं अपने सामने ही उसे तैयार  कर दूँ । ध्रतराष्ट्र की तरह पुत्र मोह्ग्रस्तों की मानो बाढ़ आ गयी है। राजा भरत के सौ पुत्र थे । पर उन्होंने कहा की राज्य में जो सबसे योग्य में जो सबसे योग्य व्यक्ति होगा, वही राजा बनेगा । सभी हमारी  संतानें हैं । सबको अवसर मिलना चाहिए । भूमन्यु नामक एक युवा को सर्वोत्क्रष्ट्र पाया गया । उसे भरत का  उत्तराधिकारी  बनाया  गया । यद्यपि भरत के सौ पुत्र भी प्रतिस्पदर्धा में थे, पर असफल रहे फिर भी किसी के मन में विद्वेष नहीं आया । सभी ने सम्राट भुमंयु का साथ दिया । भुमंयु ने भी अपने पुत्र को राजा नहीं बनाया, प्रजा के ही एक श्रेष्ट व्यक्ति को राजा बनाया । यह परम्परा चलती रही ।
जब दुर्योधन युधिशिठर को पाँच गाँव भी नहीं देने को तैयार था, जब भीष्म पितामह ने पुरखों को आमंत्रित कर कुल का विवरण देने को कहा । तब उन पुरखों ने दुर्योधन युधिशिठर को राजा भरत से लेकर भीष्म तक चली आ रही पूरी परम्परा का विवरण दिया कि कोण कोण  इस सिंहासन पर बैठ चुका है, पर दुर्बुर्द्धि दुर्योधन युद्ध ही चाहता था ।  आज कलिकाल है । दुर्बुद्धि का ही साम्राज्य है ।  इसीलिए यह पुत्रइषणा कि बिडम्बना छाई दिखाई देती है ।